जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप गहरे अंतरिक्ष को कैसे देखता है? (How James Webb Space Telescope Works in Hindi)

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जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) एक इन्फ्रारेड ब्रह्मांडीय टाइम मशीन है जो पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर सूर्य-पृथ्वी के लैग्रेंज पॉइंट 2 ($L_2$) पर स्थित है। चूँकि ब्रह्मांड के लगातार फैलने से प्राचीन तारों का प्रकाश दृश्य तरंगों से खिंचकर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रम (रेडशिफ्ट) में बदल जाता है, इसलिए वेब 18 षट्कोणीय सोने की परत चढ़े बेरिलियम दर्पणों से बने 6.5 मीटर चौड़े प्राथमिक दर्पण का उपयोग करता है। 5 परतों वाली कैप्टन सनशील्ड द्वारा 300°C के तापांतर पर सुरक्षित, वेब के क्रायोजेनिक सेंसर घने ब्रह्मांडीय धूल के बादलों को चीरकर बिग बैंग के मात्र 25-35 करोड़ वर्ष बाद बनी पहली आकाशगंगाओं को देख सकते हैं।
25 दिसंबर 2021 को क्रिसमस के दिन, फ्रेंच गुयाना के कोरू अंतरिक्ष केंद्र से एरियन 5 रॉकेट ने एक ऐसी वैज्ञानिक पेलोड को अंतरिक्ष में भेजा जो मानव इतिहास का सबसे जटिल, महत्वाकांक्षी और संवेदनशील उपकरण था: 10 अरब डॉलर का जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST)।
नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA), और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (CSA) के अंतरराष्ट्रीय सहयोग से निर्मित इस दूरबीन को हबल स्पेस टेलीस्कोप (Hubble) का उत्तराधिकारी माना गया।
लेकिन जेम्स वेब को केवल "हबल का रिप्लेसमेंट" कहना इसके भौतिकी सिद्धांतों को गलत समझना होगा। हबल मुख्य रूप से दृश्य प्रकाश (Visible Light) और पराबैंगनी प्रकाश (UV) में ब्रह्मांड को देखता था। लेकिन जेम्स वेब को एक बिल्कुल अलग काम के लिए डिज़ाइन किया गया: यह ब्रह्मांड को शुद्ध अवरक्त (इन्फ्रारेड - Infrared) ऊष्मा तरंगों में देखता है।
इन्फ्रारेड किरणों को पकड़कर जेम्स वेब उन धूल के घने बादलों के आर-पार देख सकता है जहाँ नए तारे और सौरमंडल जन्म ले रहे होते हैं, दूर स्थित बाह्यग्रहों (Exoplanets) के वायुमंडल में जीवन के संकेतों की रासायनिक जांच कर सकता है, और 13.5 अरब वर्ष पीछे देखकर ब्रह्मांड के सबसे पहले तारों के जन्म का साक्षात गवाह बन सकता है।
आइए समझते हैं मानवता की इस सबसे महान ब्रह्मांडीय टाइम मशीन का संपूर्ण विज्ञान।
1. इन्फ्रारेड ही क्यों? डीप स्पेस ऑप्टिक्स के दो बुनियादी नियम
यह समझने के लिए कि वेब को एक इन्फ्रारेड दूरबीन क्यों बनाया गया, आपको भौतिकी की दो प्रमुख घटनाओं को समझना होगा: कॉस्मिक रेडशिफ्ट (Cosmic Redshift) और धूल का प्रकीर्णन (Dust Scattering)।
कॉस्मिक रेडशिफ्ट का प्रभाव
प्रारंभिक ब्रह्मांड (13.5 अरब वर्ष पहले) आज जेम्स वेब द्वारा देखा गया रूप
पहले तारों ने उच्च ऊर्जा वाला नीली रोशनी 13.5 अरब वर्षों में अंतरिक्ष के खिंचाव ने
और पराबैंगनी (UV) प्रकाश उत्सर्जित किया तरंगदैर्ध्य को खींचकर इन्फ्रारेड में बदल दिया
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तरंगदैर्ध्य: 0.2 - 0.5 μm तरंगदैर्ध्य: 1.0 - 28.0 μm
(पराबैंगनी व नीला दृश्य प्रकाश) (नियर और मिड-इन्फ्रारेड ऊष्मा)
कारण 1: कॉस्मिक रेडशिफ्ट और अंतरिक्ष का विस्तार
जब प्रकाश अंतरिक्ष में अरबों वर्षों तक यात्रा करता है, तो वह किसी स्थिर खाली जगह से नहीं गुजरता। वह ऐसे अंतरिक्ष (Spacetime) से होकर गुजरता है जो खुद लगातार फैल और खिंच रहा है।
जब बिग बैंग के लगभग 30 करोड़ वर्ष बाद ब्रह्मांड के पहले तारे चमके, तो उन्होंने तीव्र नीले और पराबैंगनी (UV) प्रकाश का उत्सर्जन किया था। 13.5 अरब वर्षों की लंबी यात्रा के दौरान, फैलते हुए अंतरिक्ष ने उस प्रकाश तरंगों को एक अकॉर्डियन (Accordion) की तरह खींच दिया।
जब वे फोटॉन आज हमारे पास पहुँचते हैं, तो उनकी तरंगदैर्ध्य 10 से 15 गुना तक खिंच चुकी होती है ($z \ge 10$ का कॉस्मिक रेडशिफ्ट)। वे दृश्य प्रकाश से बाहर निकलकर गहरे नियर और मिड-इन्फ्रारेड (0.6 से 28 माइक्रोन) में बदल चुके होते हैं।
यदि आप हबल जैसी किसी सामान्य दूरबीन से उस प्राचीन ब्रह्मांड की ओर देखेंगे, तो आपको केवल घना अंधेरा दिखाई देगा—इसलिए नहीं कि वहाँ आकाशगंगाएं नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उनका प्रकाश इंसानी आँखों के लिए अदृश्य इन्फ्रारेड तरंगों में बदल चुका है!
कारण 2: रेले प्रकीर्णन और धूल के बादलों को चीरना
दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्ध्य बहुत छोटी होती है (400 से 700 नैनोमीटर), जो अंतरिक्ष में तैरने वाले धूल और धुएं के कणों के आकार के बराबर होती है।
रेले प्रकीर्णन (Rayleigh Scattering) के नियम के अनुसार, छोटे कणों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन तरंगदैर्ध्य की चौथी घात के व्युत्क्रमानुपाती होता है:
$$\text{प्रकीर्णन तीव्रता} \propto \frac{1}{\lambda^4}$$
चूँकि इन्फ्रारेड प्रकाश की तरंगें दृश्य प्रकाश से कई गुना लंबी होती हैं, वे धूल के कणों से टकराए बिना सीधे उनके आर-पार निकल जाती हैं। जो नेबुला (नीहारिकाएं) हबल की तस्वीरों में काली, अपारदर्शी दीवारों जैसी दिखती थीं, वे जेम्स वेब की इन्फ्रारेड दृष्टि में पूरी तरह पारदर्शी कांच जैसी हो जाती हैं, जिससे उनके भीतर जन्म ले रहे शिशु तारे साफ दिखाई देते हैं।
2. लैग्रेंज पॉइंट 2 ($L_2$): पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर क्यों?
हबल दूरबीन पृथ्वी की सतह से मात्र 550 किलोमीटर ऊपर चक्कर काटती है। यह पृथ्वी के बहुत करीब थी, इसलिए अंतरिक्ष यात्री स्पेस शटल से जाकर उसकी मरम्मत कर सकते थे। लेकिन इन्फ्रारेड खगोल विज्ञान के लिए यह स्थान एक अभिशाप था।
पृथ्वी और चंद्रमा इन्फ्रारेड ऊष्मा उत्सर्जित करने वाले विशाल गर्म गोले हैं। हर 90 मिनट में सूर्य की चिलचिलाती धूप में आना-जाना किसी भी इन्फ्रारेड दूरबीन के सेंसरों को अंधा कर देता।
अति-सूक्ष्म इन्फ्रारेड सिग्नलों को पकड़ने के लिए वेब को अंतरिक्ष के सबसे ठंडे कोने में रखना आवश्यक था। नासा ने इसके लिए सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज पॉइंट 2 ($L_2$) को चुना:
सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज पॉइंट 2 (L2)
वेब की हेलो कक्षा
सूर्य पृथ्वी (L2)
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◄─────────────── 15 करोड़ किमी ──────────────► │
◄────── 15 लाख किमी ──────►│
* गर्मी के सभी स्रोत (सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा) सनशील्ड के एक ही तरफ रहते हैं!
पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर पीछे स्थित $L_2$ अंतरिक्ष में वह बिंदु है जहाँ सूर्य और पृथ्वी का संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल ठीक उतना ही अपकेंद्री बल (Centrifugal Force) प्रदान करता है, जिससे कोई वस्तु पृथ्वी के साथ-साथ ठीक 365 दिनों में सूर्य की परिक्रमा कर सके।
यहाँ रहने के तीन भारी लाभ हैं:
- स्थायी छाया: सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा हमेशा दूरबीन की सनशील्ड के ठीक एक ही तरफ रहते हैं। दूरबीन को कभी अपना सुरक्षा कवच घुमाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
- अबाध अवलोकन: दूरबीन कभी पृथ्वी की छाया में नहीं छिपती, जिससे हफ्तों तक बिना रुके लगातार तस्वीरें ली जा सकती हैं।
- थर्मल स्थिरता: यहाँ तापमान लगातार एक समान रहता है, जिससे दूरबीन के नाजुक दर्पणों में तापमान के उतार-चढ़ाव से कोई विकृति नहीं आती।
वेब ठीक $L_2$ बिंदु पर स्थिर बैठने के बजाय उसके चारों ओर एक लूपिंग हेलो कक्षा (Halo Orbit) में चक्कर लगाता है, ताकि वह कभी भी पृथ्वी की छाया में न आए और उसके सौर पैनलों को लगातार बिजली मिलती रहे।
3. पाँच परतों वाली कैप्टन सनशील्ड: SPF 10,00,000 की सुरक्षा
दूरबीन के संवेदनशील कैमरों को सही ढंग से काम करने के लिए $-233^\circ\text{C}$ (40 केल्विन) के अत्यधिक ठंडे तापमान पर रहना अनिवार्य है। यदि दूरबीन का अपना शरीर गर्म होगा, तो उसके अपने दर्पणों की गर्मी उसके कैमरों को अंधा कर देगी—जैसे जलते हुए बल्बों से बनी दूरबीन से तारों को देखने की कोशिश करना!
दूरबीन को बिना किसी भारी तरल शीतलक (Coolant) के लगातार ठंडा रखने के लिए वैज्ञानिकों ने एक टेनिस कोर्ट जितनी बड़ी पाँच परतों वाली कैप्टन (Kapton) सनशील्ड बनाई:
सनशील्ड का 300 डिग्री का तापांतर (Thermal Gradient)
गर्म सिरा (+85°C / 185°F) ठंडा सिरा (-233°C / 40 K)
सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की ओर गहरे ब्रह्मांड की ओर
सौर पैनल व संचार उपकरण बेरिलियम दर्पण व वैज्ञानिक कैमरे
सूर्य ──► ||||| ───────────────────► [प्राथमिक दर्पण व इन्फ्रारेड उपकरण]
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परत 1: 0.050 मिमी कैप्टन + सिलिकॉन/एल्युमिनियम (सौर विकिरण को वापस उछालती है)
परत 2: 0.025 मिमी कैप्टन + एल्युमिनियम (गर्मी को किनारों से बाहर निकालती है)
परत 3: 0.025 मिमी कैप्टन + एल्युमिनियम
परत 4: 0.025 मिमी कैप्टन + एल्युमिनियम
परत 5: 0.025 मिमी कैप्टन + एल्युमिनियम (यहाँ तापमान 40 केल्विन रह जाता है!)
वैक्यूम गैप का विज्ञान
एक मोटे पर्दे की जगह पाँच अलग-अलग पतली चादरें क्यों लगाई गईं?
अंतरिक्ष के निर्वात (Vacuum) में ऊष्मा का संवहन (Convection) या चालन (Conduction) नहीं हो सकता; ऊष्मा केवल विकिरण (Radiation) द्वारा यात्रा करती है।
सनशील्ड की प्रत्येक परत अत्यंत हल्की कैप्टन पॉलीइमाइड फिल्म से बनी है, जिस पर एल्युमिनियम और सिलिकॉन की आणविक परत चढ़ाई गई है। इन पाँचों परतों के बीच खाली वैक्यूम गैप है और इन्हें विशेष कोणों पर मोड़ा गया है:
- पहली परत सूर्य से आने वाली लगभग 2,00,000 वॉट की भीषण गर्मी को सोखती और वापस उछालती है, जिससे इसका तापमान $+85^\circ\text{C}$ तक पहुँच जाता है।
- जो थोड़ी सी गर्मी पहली परत को पार करती है, वह किनारों से बाहर अंतरिक्ष में फेंक दी जाती है।
- पाँचवीं परत तक पहुँचते-पहुँचते गर्मी 1 वॉट से भी कम रह जाती है, जिससे ठंडी तरफ का तापमान गिरकर $-233^\circ\text{C}$ (40 केल्विन) हो जाता है।
यह एक कार्डबोर्ड बॉक्स जितनी पतली ढाल पर $300^\circ\text{C}$ का तापांतर पैदा करती है, जिसका सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) 10,00,000 है!
4. 6.5 मीटर का प्राथमिक दर्पण: सोना, बेरिलियम और नैनोमीटर एक्यूएटर्स
हबल का प्राथमिक दर्पण 2.4 मीटर चौड़े कांच का एक ही टुकड़ा था। लेकिन सुदूर आकाशगंगाओं से आने वाले कुछ ही फोटॉनों को समेटने के लिए वेब को 6.5 मीटर के विशाल दर्पण की आवश्यकता थी।
पृथ्वी पर ऐसा कोई रॉकेट नहीं था जिसके फेयरिंग में 6.5 मीटर चौड़ा ठोस दर्पण समा सके। नासा ने इसका ओरिगेमी (Origami) समाधान निकाला: 18 षट्कोणीय (Hexagonal) टुकड़ों से बना एक मुड़ने वाला दर्पण, जो रॉकेट में सिमटकर गया और अंतरिक्ष में अपने आप खुला।
18 षट्कोणीय बेरिलियम-गोल्ड दर्पण
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व्यास: 6.5 मीटर (21.3 फीट) · प्रकाश संग्रहण क्षेत्रफल: 25.4 वर्ग मीटर
सामग्री: संरचनात्मक बेरिलियम · कोटिंग: 100 नैनोमीटर शुद्ध वाष्पीकृत सोना
बेरिलियम ही क्यों?
कांच बहुत भारी होता है और जब वह अंतरिक्ष के $-233^\circ\text{C}$ तापमान में ठंडा होता है तो बुरी तरह सिकुड़कर विकृत हो जाता है। इसके विपरीत बेरिलियम बेहद हल्का और स्टील से भी ज्यादा मजबूत धातु है, जो इतने भीषण ठंडे तापमान में भी अपना आकार बिल्कुल नहीं बदलती।
सोना ही क्यों?
वेब के दर्पण सुनहरे पीले रंग में चमकते हैं। यद्यपि सोना नीले और हरे प्रकाश को सोख लेता है, लेकिन इन्फ्रारेड किरणों के लिए यह दुनिया का सबसे बेहतरीन परावर्तक है—यह इन्फ्रारेड किरणों के 98% फोटॉनों को सीधे परावर्तित करता है।
हैरानी की बात यह है कि पूरे 18 दर्पणों (25 वर्ग मीटर क्षेत्रफल) पर चढ़ाई गई सोने की परत केवल 100 नैनोमीटर मोटी है (इंसानी बाल से 1,000 गुना पतली)। पूरी दूरबीन पर कुल मिलाकर मात्र 48 ग्राम शुद्ध सोना लगा है—एक गोल्फ की गेंद जितना!
नैनोमीटर एक्यूएटर्स द्वारा संरेखण
प्रत्येक दर्पण के पीछे छह मोटर चालित एक्यूएटर्स (Actuators) लगे हैं। ये एक्यूएटर्स दर्पण के टुकड़ों को मात्र 10 नैनोमीटर की सूक्ष्मता से हिला सकते हैं (इंसानी बाल की मोटाई का दस-हज़ारवाँ हिस्सा)। कंप्यूटर इन 18 टुकड़ों को इस तरह मिलाता है कि वे मिलकर एक अखंड 6.5 मीटर के परवलयाकार (Parabolic) दर्पण की तरह काम करते हैं।
5. चार प्रमुख वैज्ञानिक उपकरण और MIRI का क्रायोकूलर
वेब के भीतर चार अत्यंत आधुनिक कैमरे और स्पेक्ट्रोग्राफ लगे हैं:
| उपकरण | पूरा नाम | तरंगदैर्ध्य | प्राथमिक वैज्ञानिक कार्य |
|---|---|---|---|
| NIRCam | नियर-इन्फ्रारेड कैमरा | 0.6 – 5.0 $\mu\text{m}$ | मुख्य कैमरा; प्राचीन आकाशगंगाओं, तारा समूहों और डीप-फील्ड की तस्वीरें लेता है। |
| NIRSpec | नियर-इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ | 0.6 – 5.0 $\mu\text{m}$ | एक साथ 100 आकाशगंगाओं के स्पेक्ट्रम का विश्लेषण करके उनकी रासायनिक संरचना और दूरी मापता है। |
| NIRISS | नियर-आईआर इमेजर व स्लिटलेस स्पेक्ट्रोग्राफ | 0.6 – 5.0 $\mu\text{m}$ | बाह्यग्रहों के वायुमंडल की स्पेक्ट्रोस्कोपी; पानी, मीथेन और CO2 की पहचान। |
| MIRI | मिड-इन्फ्रारेड इंस्ट्रूमेंट | 4.9 – 28.8 $\mu\text{m}$ | लंबी तरंगदैर्ध्य; घने धूल के बादलों के भीतर देखना और ठंडे धूमकेतुओं का अध्ययन। |
MIRI को 6.7 केल्विन तक ठंडा करने की चुनौती
सनशील्ड पूरी दूरबीन को 40 केल्विन ($-233^\circ\text{C}$) तक तो ठंडा कर देती है, लेकिन MIRI जिस लंबी इन्फ्रारेड तरंगदैर्ध्य में काम करता है, उसके लिए 40 केल्विन भी बहुत गर्म है!
MIRI को काम करने के लिए 6.7 केल्विन ($-266.5^\circ\text{C}$) का तापमान चाहिए—परम शून्य (Absolute Zero) से मात्र सात डिग्री ऊपर!
चूँकि तरल हीलियम समय के साथ उड़ जाती है, इसलिए नासा ने एक बंद-लूप (Closed-loop) हीलियम पल्स-ट्यूब क्रायोकूलर बनाया। यह हीलियम गैस को यांत्रिक रूप से कंप्रेस और रीसायकल करता है बिना उसे अंतरिक्ष में उड़ाए। इस तकनीक के कारण जेम्स वेब का जीवनकाल तरल हीलियम के खत्म होने से नहीं बंधा है, और यह 20 से अधिक वर्षों तक काम कर सकता है।
6. ऐतिहासिक खोजें: खगोल विज्ञान की किताबों का पुनर्लेखन
जुलाई 2022 में अपनी पहली तस्वीर भेजने के बाद से, वेब ने ब्रह्मांड विज्ञान के कई सिद्धांतों को बदल दिया है:
1. ब्रह्मांड की सबसे दूरस्थ आकाशगंगा: JADES-GS-z14-0
वर्ष 2024 में वैज्ञानिकों ने पुष्टि की कि वेब ने $z = 14.32$ के अविश्वसनीय रेडशिफ्ट पर स्थित एक आकाशगंगा खोजी है जिसका नाम JADES-GS-z14-0 है।
इसका अर्थ है कि हम इस आकाशगंगा को बिग बैंग के मात्र 29 करोड़ वर्ष बाद के रूप में देख रहे हैं। पुराने सिद्धांतों का मानना था कि इतनी शुरुआत में आकाशगंगाएं बहुत धुंधली और छोटी होंगी। लेकिन वेब ने दिखाया कि यह आकाशगंगा आश्चर्यजनक रूप से बड़ी, चमकीली और ऑक्सीजन से भरपूर है—यह साबित करते हुए कि ब्रह्मांड के शुरुआती तारे उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से जन्मे और विकसित हुए थे।
2. बाह्यग्रहों के वायुमंडल की जांच
जब कोई ग्रह अपने तारे के सामने से गुजरता है, तो तारे की रोशनी उस ग्रह की हवा से छनकर निकलती है। वेब उस रोशनी के रंगों को मापकर वायुमंडल की गैसों का पता लगाता है:
- WASP-96b व WASP-39b: पहली बार किसी विदेशी ग्रह के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$), सल्फर डाइऑक्साइड और पानी के बादलों का स्पष्ट प्रमाण मिला।
- K2-18b: रहने योग्य क्षेत्र (Habitable Zone) में स्थित एक सब-नेप्च्यून ग्रह पर मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी कार्बन-आधारित गैसों की ऐतिहासिक खोज।
7. सारांश एवं मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)
| विशेषता | जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) विवरण |
|---|---|
| प्राथमिक दर्पण व्यास | 6.5 मीटर (21.3 फीट) · 18 षट्कोणीय सोने की परत वाले टुकड़े |
| दर्पण की सामग्री | बेरिलियम धातु, 48 ग्राम शुद्ध वाष्पीकृत सोने (100 nm) से लेपित |
| अवलोकन तरंगदैर्ध्य | 0.6 से 28.8 माइक्रोन (नियर और मिड-इन्फ्रारेड) |
| कक्षा की स्थिति | सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज पॉइंट 2 ($L_2$) · पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर |
| थर्मल ढाल | 5 परतों वाली कैप्टन सनशील्ड जो 300°C का तापांतर बनाती है (SPF 10,00,000) |
| कार्यकारी तापमान | मुख्य दूरबीन: 40 केल्विन ($-233^\circ\text{C}$); MIRI: 6.7 केल्विन ($-266.5^\circ\text{C}$) |
| सबसे पुरानी आकाशगंगा | JADES-GS-z14-0 (बिग बैंग के मात्र 29 करोड़ वर्ष बाद की) |
- इन्फ्रारेड टाइम मशीन: ब्रह्मांड के विस्तार के कारण 13.5 अरब वर्ष पुराना प्रकाश खिंचकर इन्फ्रारेड में बदल जाता है, जिसे केवल वेब जैसी अवरक्त दूरबीन ही देख सकती है।
- धूल के पार दृष्टि: इन्फ्रारेड की लंबी तरंगें ब्रह्मांडीय धूल के कणों से टकराए बिना सीधे निकल जाती हैं, जिससे नेबुला के भीतर छिपे तारों का जन्म साफ दिखाई देता है।
- $L_2$ का सामरिक लाभ: पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर होने के कारण सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा हमेशा सनशील्ड के पीछे रहते हैं, जिससे दूरबीन को लगातार ठंडक मिलती है।
- स्वर्ण का परावर्तन: मात्र 48 ग्राम सोने की 100 नैनोमीटर पतली परत 98% इन्फ्रारेड किरणों को परावर्तित करके परम शून्य के करीब ठंडे किए गए कैमरों तक पहुँचाती है।
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